- September 23, 2026
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PMEGP के जरिए पोल्ट्री उद्योग में स्वरोजगार के अवसर
भारत विश्व के प्रमुख अंडा एवं पोल्ट्री उत्पादक देशों में से एक है। बढ़ती जनसंख्या, प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों की मांग तथा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसरों की आवश्यकता ने पोल्ट्री उद्योग को तेजी से विकसित होने वाले व्यवसायों में शामिल कर दिया है।
वर्तमान समय में पोल्ट्री केवल एक कृषि सहायक गतिविधि नहीं, बल्कि एक लाभदायक उद्यम के रूप में स्थापित हो चुकी है। इस क्षेत्र के विकास को गति देने में प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP), बैंकों तथा NABARD की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP)
प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) की प्रमुख क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी योजना है।
इसका संचालन राष्ट्रीय स्तर पर खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) द्वारा किया जाता है तथा राज्य स्तर पर KVIB, जिला उद्योग केंद्र (DIC) और विभिन्न बैंकों के माध्यम से लागू किया जाता है।
योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में नए सूक्ष्म उद्यम स्थापित कर स्वरोजगार एवं रोजगार सृजन को बढ़ावा देना है।
PMEGP में नवीनतम संशोधन
सरकार द्वारा PMEGP योजना को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं। विनिर्माण क्षेत्र के लिए अधिकतम परियोजना लागत ₹25 लाख से बढ़ाकर ₹50 लाख तथा सेवा क्षेत्र के लिए ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹20 लाख कर दी गई है।
पशुपालन आधारित गतिविधियों जैसे डेयरी, पोल्ट्री, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन तथा अन्य संबद्ध गतिविधियों को भी योजना के अंतर्गत शामिल किया गया है, जिससे ग्रामीण उद्यमियों को नए अवसर प्राप्त हुए हैं।
योजना के अंतर्गत सामान्य वर्ग के लाभार्थियों को ग्रामीण क्षेत्रों में 25% तथा शहरी क्षेत्रों में 15% मार्जिन मनी सब्सिडी प्रदान की जाती है।
विशेष श्रेणी (SC, ST, OBC, महिला, अल्पसंख्यक, भूतपूर्व सैनिक, दिव्यांगजन आदि) के लाभार्थियों को ग्रामीण क्षेत्रों में 35% तथा शहरी क्षेत्रों में 25% तक सब्सिडी उपलब्ध है।
सामान्य वर्ग को परियोजना लागत का 10% तथा विशेष वर्ग को केवल 5% स्वयं निवेश करना होता है। शेष राशि बैंक ऋण के रूप में उपलब्ध कराते हैं।
पोल्ट्री क्षेत्र में अपार संभावनाएँ
भारत में अंडे एवं चिकन की मांग लगातार बढ़ रही है। शहरीकरण, आय वृद्धि और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के कारण पोल्ट्री उत्पादों का बाजार निरंतर विस्तार कर रहा है।
ब्रॉयलर फार्मिंग, लेयर फार्मिंग, हैचरी, चूजा उत्पादन, पोल्ट्री फीड निर्माण तथा अंडा विपणन जैसे अनेक क्षेत्रों में रोजगार एवं स्वरोजगार की व्यापक संभावनाएँ मौजूद हैं।
एक सुव्यवस्थित पोल्ट्री इकाई कम समय में नियमित आय प्रदान कर सकती है। ब्रॉयलर यूनिट में लगभग 40-45 दिनों में उत्पादन तैयार हो जाता है, जबकि लेयर यूनिट से प्रतिदिन अंडों की बिक्री के माध्यम से नियमित नकदी प्रवाह प्राप्त होता है।
यही कारण है कि बैंक भी व्यवहार्य पोल्ट्री परियोजनाओं को वित्तपोषित करने में रुचि दिखाते हैं।
बैंकिंग दृष्टिकोण से PMEGP
बैंकिंग प्रणाली PMEGP की सफलता का आधार स्तंभ है। बैंक किसी भी परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता, आर्थिक लाभप्रदता, बाजार उपलब्धता, पुनर्भुगतान क्षमता तथा उद्यमी की योग्यता का मूल्यांकन करने के बाद ऋण स्वीकृत करते हैं।
पोल्ट्री परियोजना का मूल्यांकन करते समय बैंक सामान्यतः निम्न बिंदुओं पर विशेष ध्यान देते हैं:
- भूमि एवं शेड की उपलब्धता
- जल एवं विद्युत सुविधा
- पक्षियों की संख्या एवं उत्पादन क्षमता
- बाजार एवं विपणन व्यवस्था
- कार्यशील पूंजी की आवश्यकता
- जैव सुरक्षा (Bio-Security) प्रबंधन
- पशु चिकित्सा सुविधाएँ
- उद्यमी का अनुभव एवं प्रशिक्षण
बैंक यह भी सुनिश्चित करते हैं कि ऋण का उपयोग स्वीकृत परियोजना के अनुसार ही किया जाए। समय-समय पर निरीक्षण एवं निगरानी के माध्यम से परियोजना की प्रगति का मूल्यांकन किया जाता है।
PMEGP के अंतर्गत प्राप्त सब्सिडी सीधे ऋण खाते में समायोजित की जाती है, जिससे ऋण का प्रभावी बोझ कम हो जाता है।
NABARD की भूमिका

NABARD की भूमिका
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) ग्रामीण विकास एवं कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने वाली देश की शीर्ष वित्तीय संस्था है।
यद्यपि PMEGP का प्रत्यक्ष संचालन KVIC एवं MSME मंत्रालय द्वारा किया जाता है, फिर भी NABARD पोल्ट्री क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
NABARD विभिन्न बैंकों को ग्रामीण ऋण योजनाओं, संभावित परियोजना रिपोर्टों, क्षमता निर्माण कार्यक्रमों तथा वित्तीय मार्गदर्शन के माध्यम से सहायता प्रदान करता है। NABARD द्वारा तैयार मॉडल बैंक योग्य परियोजनाएँ (Bankable Projects) पोल्ट्री उद्यमियों एवं बैंकों दोनों के लिए उपयोगी सिद्ध होती हैं।
इसके अतिरिक्त NABARD ग्रामीण उद्यमिता, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), महिला स्वयं सहायता समूहों तथा कृषि आधारित व्यवसायों को भी प्रोत्साहित करता है।
पोल्ट्री परियोजना के लिए आवश्यक तैयारी
PMEGP के अंतर्गत सफल ऋण स्वीकृति के लिए उद्यमी को विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करनी चाहिए। इसमें परियोजना लागत, भवन एवं शेड निर्माण, उपकरण, चूजे, फीड, दवाइयाँ, बीमा, कार्यशील पूंजी तथा अनुमानित आय-व्यय का स्पष्ट विवरण होना चाहिए।
उद्यमी को Udyam Registration, आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक खाता, भूमि संबंधी दस्तावेज तथा अन्य आवश्यक अभिलेख तैयार रखने चाहिए।
परियोजना की सफलता के लिए उद्यमिता विकास प्रशिक्षण (EDP) भी अत्यंत उपयोगी माना जाता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
पोल्ट्री क्षेत्र में स्थापित प्रत्येक इकाई प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार सृजित करती है। चूजा आपूर्ति, दाना उत्पादन, परिवहन, विपणन, पशु चिकित्सा सेवाएँ तथा प्रसंस्करण उद्योग भी इससे लाभान्वित होते हैं।
विशेष रूप से महिलाओं, युवाओं एवं छोटे किसानों के लिए यह आय का एक स्थायी स्रोत बन रहा है। PMEGP के माध्यम से हजारों उद्यमी आज रोजगार मांगने वाले नहीं, बल्कि रोजगार देने वाले बन चुके हैं।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम, बैंकिंग प्रणाली और NABARD का समन्वित प्रयास भारत के पोल्ट्री क्षेत्र को नई दिशा प्रदान कर रहा है।
सरकार की सब्सिडी, बैंकों की वित्तीय सहायता तथा NABARD के तकनीकी मार्गदर्शन के कारण पोल्ट्री उद्योग ग्रामीण उद्यमिता का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है।
यदि युवा उद्यमी उचित परियोजना योजना, आधुनिक प्रबंधन तकनीकों और वित्तीय अनुशासन के साथ इस योजना का लाभ उठाएँ, तो पोल्ट्री उद्योग न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बना सकता है, बल्कि ग्रामीण भारत में रोजगार, आय और समृद्धि के नए द्वार भी खोल सकता है।






















